Padosi ke huqooq hindi – पड़ोसी के क्या हुकूक हैं

 

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

पड़ोसी के हुकुक –

वो शख्स कामिल ईमान वाला नहीं हो सकता, जो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा रहे | पड़ोसी के मुताल्लिक बहुत सारी हदीसें, नबी करीम (स०अ०) से वारिद हैं |

 

कुरआन मजीद में अल्लाह तआला का इरशाद –

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं –

तर्जुमा –
‘तुम अल्लाह तआला की इबादत इख्तियार करो और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक मत करो और अपने वालिदैन के साथ अच्छा मामला करो और दूसरे अहले कराबत के साथ भी और यतीमों के साथ और गुरबा के साथ और पास वाले पड़ोसी के साथ भी और दूर वाले पड़ोसी के साथ भी और हम मज्लिस के साथ भी और मुसाफ़िर के साथ भी। (सुरह – निसा )

 

पड़ोसी के हुकूक के मुताल्लिक हदीसें –

एक हदीस में हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इरशाद वारिद हुआ है, जानते हो कि पड़ोसी का क्या हक है? अगर वह तुझसे मदद चाहे, उसकी मदद कर, अगर कर्ज मांगे तो उसको कर्ज दे, अगर मुहताज हो तो उसकी इआनत कर, अगर बीमार हो तो इयादत कर, अगर वह मर जाये तो उसके जनाज़े के साथ जा, अगर उसको खुशी हासिल हो तो मुबारकबाद दे, अगर मुसीबत पहुंचे तो ताज़ियत कर | बगैर उसकी इजाज़त के उसके मकान के पास अपना मकान ऊँचा न कर, जिससे उसकी हवा रूक जाए। अगर तू कोई फल खरीदे तो उसको भी हद्या दे, और अगर यह न हो सके तो उस फल को ऐसी तरह पोशीदा घर में ला कि यह न देखे और उसको तेरी औलाद बाहर लेकर न निकले ताकि पड़ोसी के बच्चे उसको देखकर रंजीदा न हों और अपने घर के धुएं से उसको तकलीफ़ न पहुंचा, मगर उस सूरत में कि जो पकाए, उसमें से उसका भी हिस्सा लगाये, तुम जानते हो कि पड़ोसी का कितना हक है? कसम है उस पाक जात की जिसके कब्जे में मेरी जान है कि उसके हक को उसके सिवा कोई नहीं जानता, जिस पर अल्लाह रहम करे।

हज़रत इब्ने उमर रजि० के गुलाम ने एक बकरी ज़िब्ह की। हज़रत इब्ने उमर रजि० ने फरमाया कि जब उसकी खाल निकाल चुको तो सबसे पहले उसके गोश्त में से मेरे यहूदी पड़ोसी को देना। कई दफ़ा यही लफ़्ज़ फ़रमाया। गुलाम ने उर्ज किया कि आप कितनी मर्तबा इसको फ़रमायेंगे। हज़रत इन्ने उमर रजि. ने फ़रमाया कि मैं ने हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सुना, वह फ़रमाते थे कि मुझे हज़रत जिब्रील अलैहि० बार बार पड़ोसी के मुताल्लिक ताकीद फुरमाते रहे, (इसलिए मैं बार बार कह रहा हूँ।)

 

नबी करीम (स०अ०) के मुताबिक कौन मोमिन नहीं –

एक हदीस में आया है कि हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (तीन मर्तबा) फ़रमाया, खुदा की कसम । मोमिन नहीं है। खुदा की कसम ! मोमिन नहीं है।, खुदा की कसम ! मोमिन नहीं है। किसी ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! कौन शख्स ? हुज़ूर सल्ल० ने फ़रमाया जिसका पड़ोसी उसकी मुसीबतों (और बदियों) से मामून (महफूज़) न हो।

एक और हदीस में है कि जन्नत में वह शख्स दाखिल न होगा जिस का पड़ोसी उसकी मुसीबतों से मामून (महफूज़) न हो।

 

पड़ोसी का वारिस बनाने का गुमान –

हज़रत इब्ने उमर रज़ि और हज़रत आइशा दोनों हज़रात हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वह इर्शाद नकल करते हैं कि हज़रत जिब्रील अलै. मुझे पड़ोसी के बारे में इस कदर ताकीद करते रहे कि मुझे उनकी ताकीदों से यह गुमान हुआ कि पड़ोसी को वारिस बना कर रहेंगे। (मिश्कात)

 

कितने घरों तक पड़ोस कहलाता है –

हसन बसरी (रह०) से किसी ने पूछा कि पड़ोस कहाँ तक है? उन्होंने फ़रमाया कि चालीस मकान आगे की जानिब और चालीस पीछे की जानिब, चालीस दाएं और चालीस बाएं जानिब ।

 

पड़ोसी की इत्तेबा –

हज़रत अबू हुरैरह रजि० से नकल किया गया कि दूर के पड़ोसी से इब्तिदा न की जाए, बल्कि पास के पड़ोसी से इब्तिदा की जाए।

हज़रत आइशा रजि. ने हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दर्यात किया कि मेरे दो पड़ोसी हैं, किस से इब्तिदा करूँ? हुजूर सल्ल० ने फरमाया, जिसका दरवाज़ा तेरे दरवाज़े के करीब हो।

 

पड़ोसी के दो पहलु –

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि से मुख्तलिफ तरीक से नकल किया गया है कि पास का पड़ोसी वह है जिस से कुर्बत हो और दूर का पड़ोसी वह है जिससे कुराबत न हो।

नौफ शामी रह से नकल किया गया कि पास का पड़ोसी मुसलमान पड़ोसी है और दूर का पड़ोसी यहूद व नसारा (यानी गैर- मुस्लिम)

 

पड़ोसी तीन तरह के हैं –

हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पाक इर्शाद नकल किया गया है कि पड़ोसी तीन तरह के हैं –

1. एक वह पड़ोसी, जिसके तीन हक़ हों, पड़ोस का हक, रिश्तेदारी का हक और इस्लाम का हक।

2. दूसरी किस्म वह है जिसके दो हक हों, पड़ोस का हक और इस्लाम का हक़

3. तीसरी किस्म वह है जिसका एक ही हक हो, वह गैर मुस्लिम पड़ोसी है।

अल्लाह करीम हमें पड़ोसियों के हुकूक अदा करने की तौफीक़ अता फरमाए – अमीन

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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दुआ की गुज़ारिश

 

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