Jang e Uhad - उहद की लड़ाई का क़िस्सा

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

जंग ए उहद –

बदर की लड़ाई के बाद दूसरी बड़ी जंग जो मुसलमानों और कुफ्फार के बीच हुई वो जंग ए उहद है | जंग ए उहद में मुसलमानों की एक गलती की वजह से शिकस्त हुई और बहुत से  सहाबा (रज़ी०) शहीद हुए |

 

जंग से पहले का हाल –

जंग ए बदर में कुफ्फार को शिकस्त हुई, इस बात से उनके दिलों में बदला लेने की तड़प पैदा हुई  और दूसरी जंग के लिए तय्यारी शुरू करने में मसरूफ हो गये | एक बड़ा लश्कर तैयार किया गया यहाँ तक के मक्के के हब्शी गुलाम को भी इस जंग में शरीक किया गया | कुफ्फार के लश्कर के  सरदार अबू सुफियान थे |

उधर मदीने में जब नबी करीम (स०अ०) को इस बात की खबर हुई तो आप (स०अ०) ने शहाबा (रज़ी०) से मशवरा किया, बहुत से सहाबा (रज़ी०) की राय थी के मदीने के बाहर जाकर लडाई हो और बाज़ की राय ये थी के मदीने में जंग लड़ी जाये |

 

जंग में लश्कर की तादात –

जंग ए बदर की तरह गजवा ए उहद में भी कुफ्फार की तादाद मुसलमानों से जाएद थी | कुफ्फार की तादात तकरीबन तीन हज़ार थी जंगी सामान से लयेश थे किसी चीज़ की कमी न थी | वहीँ दूसरी तरफ मुसलमानों की तादात कमो बेश एक हज़ार की थी जिसमे कमज़ोर बूढ़े और नौजवान  थे जंगी सामान कम था | कुछ मुनिफिक भी इसमें शामिल थे जो बाद में लड़ाई करने से इनकार कर दिया था | क़रीब तीन सौ मुनाफिकों की जमात वापस हो गई और लड़ने से मना कर दिए, इस वजह से कुल मुसलमानों की तादाद सात सौ ही रह गई |

 

जंग का आग़ाज –

शव्वाल के महीने में उहद पहाड़ के क़रीब के मैदान में नबी करीम (स०अ०) अपने लश्कर के साथ मौजूद थे | उधर कुफ्फार भी अपने लश्कर के  साथ मैदान के क़रीब थी |

सबसे पहले लड़ाई की शुरुवात अबू आमिर रायेब जो कुफ्फार के तरफ से था, लड़ाई के लिए मैदान में आया और बनू औस को आवाज़ दी इसपर हज़रत हमज़ा, हज़रत अली और हज़रत अबू दजाना (रज़ी०) सहाबी सामने आये और अपनी ताक़त और शुजाअत पेश की इससे कुफ्फार के हौसले पस्त हो गए | हज़रत द्जाना (रज़ी०) ने उस काफ़िर  को क़त्ल किया |

 

हज़रत हमज़ा (रज़ी०) की शहादत –

हज़रत हमज़ा (रज़ी०) लड़ाई के लिए आगे बड़े और मुशरिकीन के अलमबरदार तलहा को क़त्ल किया और बड़ी बहादुरी से कुफ्फार के सफों में आगे बढ़ते रहे | एक हब्शी गुलाम ने आप (रज़ी०) को आगे बढ़ते हुए देखा तो एक पत्थर की आड़ में छुपकर बैठ गया और जब आप बहुत से काफिरों को क़त्ल करने में मशरूफ थे के उस हब्शी गुलाम ने पीछे से नेज़ा फ़ेक कर मारा जिससे आप (रज़ी०) शहीद हो गए |

इसी जंग में अबू सुफियान की बीवी हिन्दा ने हज़रत हमज़ा (रज़ी०) की शहादत  के बाद उनके  नाक़ और कान काट दिए थे और आप (रज़ी०) का दिल निकालकर दांतों से चबाया था |

 

 हज़रत अनस बिन नज़र (रज़ी०) की शहादत –

हज़रत अनस (रज़ीo) जग ए बदर में किसी वजह से शरीक़ ना हो सके थे, इसका उनको बहुत रंज हुआ | जब जंग ए उहद का मौक़ा हुआ तो आप बड़े ज़ोश व ख़रोश से जंग में शामिल हुए | हज़रत अनस (रज़ी०) ने देखा की सामने से एक दुसरे सहाबी हज़रत साद बिन मआज़  (रज़ी०) आ रहे हैं | उनसे कहा कि ए साद ! कहाँ जा रहे हो ? खुदा की कसम ! जन्नत की खुशबू उहद पहाड़ से आ रही है,ये कहकर तलवार हाथ में लिए काफिरों के हुजूम में घुस गए और जब तक शहीद न हुए वापस न हुए | बदन देखा गया तो 80 से जायेद जखम थे | उनकी बहन ने उँगलियों के पोरों से उनको पहचाना |

 

मुसलमान फतह के करीब –

सहाबा (रज़ी०) की बहदुरी और दीलैरी से काफ्फिरों के होसले पस्त हो गए और मैदान से पीछे हटने लगे, बहुत से कुफ्फारों की जमात के सरदार  क़त्ल हो चुके थे ये देख के सरदार ही क़त्ल हो गया, ज्यादा तर मैदान से भाग खड़े हुए | मुस्लमान फतह के बहुत करीब थे, लेकिन एक गलती से उन्हें शिकस्त हुई |

 

मुसलमानों की शिकस्त की वजह –

उहद की लड़ाई में अव्वल तो मुसलमानों को फ़तह हुई, मगर आखिर में एक गलती की वजह से मुसलमानों को शिकस्त हुई, वह गलती यह थी के हुज़ूर (स०अ०) ने कुछ आदमियों को एक ख़ास जगह मुक़ररर फ़रमाया था कि तुम लोग इतने मैं न कहूँ, इस जगह से न हटना कि  वहां से दुश्मन के हमला करने का अंदेशा था |

जब मुसलमानों को शुरू में फतह हुई तो काफिरों को भागता हुआ देखकर यह लोग भी अपने जगह से यह समझकर हट गए कि अब जंग खत्म हो चुकि, इसलिए भागते हुए काफिरों का पीछा किया जाये और गनीमत का माल हासिल किया जाये | इस जामात के सरदार ने मना भी किया कि हुज़ूर (स०अ०) की मुमानियत थी, तुम यहाँ से न हटो, मगर उन लोगों ने यह समझकर की हुज़ूर (स०अ०) का इरशाद सिर्फ़ लड़ाई के वक़्त के वासते था, वहां से हट कर मैदान में पहुच गए |

भागते हुए काफिरों ने उस जगह को खली देखकर उस तरफ से आकर हमला कर दिया | मुसलमान बे-फ़िक्र थे, इस अचानक के हमले से मग्लुब हो गए और दोनों तरफ से काफिरों के बीच आ गए |

 

नबी करीम (स०अ०) का दांत मुबारक का शहीद होना –

कुफ्फार ने चारों तरफ़ से मुसलमानों को घेर लिया, नबी करीम (स०अ०) भी वहीँ मौजूद थे | सहाबा (रज़ी०) ने घेरा बनाकर आप (स०अ०) की हिफाज़त कर रहे थे | जब सहाबा (रज़ी०) अपनी तलवार से काफ्फिरों के हुजूम को रोक रहे थे तो एक काफिर जिस का नाम उत्बा बिन अबी वक्कास था,  आप पर ज़ोर का पत्थर से हमला किया जिस से आप (स०अ०) के चेहरे मुबारक पर लगी आप पीछे खड्डे में गिर गए और आप का दन्दाने मुबारक शहीद हो गया |

 

आखिर में –

जंग ए उहद में काफी सहाबा (रज़ी०) शहीद हुए, सहाबा (रज़ी०) ने बड़ी बहादुरी से कुफ्फार का सामना करते रहे और कुफ्फार भी लड़ते – लड़ते थक चुके थे तब नबी करीम (स०अ०) ने सहाबा के साथ पहाड़ पर जाकर पनाह ली |पहाड़ पर चढ़ने की कुफ्फार की ज़ुर्रत न हुई | कुछ कुफ्फार ने कोशिश भी की लेकिन  हज़रत उमर (रज़ी०) ने उनको उपर चढ़ने से रोका | इस तरह कुफ्फार उहद पहाड़ से वापस हुए |

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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