Ek baandi ka waqiya - एक बांदी का दिसचस्प वाकिया

 

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

एक समक अमोज़ वाकिया  –

हज़रत मालिक बिन दीनार रह. एक मर्तबा बसरा की गलियों में जा रहे थे, रास्ते में एक बांदी ऐसे जाह व जलाल, हशम व ख़दम के साथ जा रही थी जैसा कि बादशाहों की बांदिया होती हैं। हज़रत मालिक रह० ने उसको देखा तो आवाज़ देकर फ़रमाया कि ऐ बांदी तुझे तेरा मालिक फुरोख़्त करता है या नहीं, वह बांदी इस फिक्र को सुनकर (हैरान रह गयी ) कहने लगी, क्या कहा, फिर कहो। उन्हों ने फिर इर्शाद फरमाया, उसने कहा, अगर वह फरोख़्त भी करे तो क्या तुझ सा फकीर खरीद सकता है? फरमाने लगे हां, और तुझ से बेहतर को खरीद सकता है। वह बांदी यह सुनकर हंस पड़ी और अपने खुद्दाम को हुक्म दिया कि इस फ़कीर को पकड़ कर हमारे साथ ले चलो (ज़रा मज़ाक ही रहेगा) खुद्दाम ने पकड़ कर साथ ले लिया, वह जब घर वापस पहुँची तो उसने अपने आका से यह किस्सा सुनाया, वह भी सुनकर हंसा और उनको अपने सामने लाने का हुक्म दिया।

 

हज़रत मालिक बिन दीनार (र०) और बांदी के आक़ा की गुफ्तगू –

जब यह सामने पेश किये गये तो आका के दिल पर एक हैबत सी उनकी छा गयी, वह कहने लगा, आप क्या चाहते हैं? उन्हों ने फरमाया कि तू अपनी बांदी को मेरे हाथ फरोख्त कर दे। उसने पूछा कि आप इसकी कीमत दे सकते हैं? हज़रत मालिक रह ने फ़रमाया कि मेरे नजदीक इसकी कीमत खजूर की दो बीझी हुई गुठलियां हैं। यह सुनकर सब हंसने लगे। उसने पूछा कि तुमने यह कीमत किस मुनासबत से तजवीज़ की? उन्होंने फ़रमाया कि इसमें ऐव बहुत हैं। उसने पूछा कि इसमें क्या क्या ऐव हैं? फ़रमाने लगे, अगर इत्र न लगाये तो बदन से बू आने लगे, अगर दांत साफ़ न करे तो मुंह में से गंध आने लगे, अगर बालों में तेल कंघी न करे तो वे परेशान हाल हो जायें, जुए उनमें पड़ जायें, (और सर में से बू आने लगे) ज़रा उम्र ज्यादा हो जायेगी तो बूढ़ी बन जायेगी (मुंह लगाने के भी काबिल न रहेगी) हैज़ इसको आता है, पेशाब पाखाना यह करती है, हर किस्म की गंदगियां (थूक, सिनक, राल, नाक के चूहे वगैरह) इसमें से निकलते रहते हैं ग़म रंज, मुसीबतें, इसको पेश आती रहती हैं। ख़ुद ग़रज़ इतनी है कि महज़ अपनी ग़रज़ से तुझसे मुहब्बत ज़ाहिर करती है, महज़ अपनी राहत व आराम की वजह से तुझसे उल्फ़त जताती है (आज कोई तक्लीफ़ तुझसे पहुँच जाये, सारी मुहब्बत ख़त्म हो जाये ) इंतिहाई बेवफ़ा, कोई कौल करार पूरा न करे, इसकी सारी मुहव्यत झूठी है, कल को तेरे बाद किसी दूसरे के पहलू में बैठेगी तो उससे भी ऐसी ही मुहब्बत के दावे करने लगेगी।

जन्नती हूर के बारे में तफसील –

मेरे पास इससे हज़ार दरजा बेहतर बांदी है जो इससे निहायत कम कीमत है, वह काफूर के जौहर से बनी हुई है, मुश्क और ज़ाफुरान की मिलावट से पैदा की गयी है, उस पर मोती और नूर लपेटा गया है और खारे पानी में उसका आवेदहन डाल दिया जाये तो वह मीठा हो जाये और मुर्दे से अगर वह बात करे तो वह जिन्दा हो जाये। अगर उसकी कलाई आफ़ताब के सामने कर दी जाये तो आफ़ताब बे-नूर हो जाये गहन हो जाये, अगर वह अंधेरे में आ जाये तो सारा घर रौशन हो जाये, चमक जाये, अगर वह दुनिया में अपनी जेब व ज़ीनत के साथ आ जाये तो सारा जहां मुअत्तर हो जाये, चमक जाये। उस बांदी ने मुश्क व जाफरान के बागों में परवरिश पायी है, याकूत और मरजान की टहनियों में खेली है, हर तरह की नेमतों के खेमे में ठसका महल सराए है, तस्नीम ( जो नत की नहरों में से एक नहर है) का पानी पीती है, कभी वायदा खिलाफ़ी नहीं करती, अपनी मुहब्बत को नहीं बदलती (हरजाई नहीं है) अब तुम ही बताओ की क़ीमत खर्च करने के एतिबार से कौन सी बांदी ज्यादा मौजू है? सबने कहा कि वही बांदी जिसकी आपने खबर दी।

 

जन्नती हूर की कीमत –

आपने फ़रमाया कि उस बांदी की कीमत हर वक्त हर ज़माने में हर शख्स के पास मौजूद है, लोगों ने पूछा कि उसकी कीमत क्या है? अपने फरमाया कि इतनी बड़ी अहम और आलीशान चीज़ के खरीदने के लिए बहुत मामूली कीमत अदा करनी पड़ती है और वह यह है कि रात का थोड़ा सा वक्त फारिग करके सिर्फ अल्लाह जल्ल शानुहू के लिए कम अज़ कम दो रक्अत तहज्जुद की पढ़ ली जायें और जब तुम खाना खाने बैठो तो किसी गरीब मुहताज को भी याद कर लो और अल्लाह जल्ल शानुहू की रिज़ा को अपनी ख्वाहिशात पर ग़ालिब कर दो, रास्ते में कोई तकलीफ़ देने वाली चीज़ कांटा, इंट बगैरह पड़ी देखो, उसको हटा दो, दुनिया की ज़िन्दगी को मामूली इख़़्राजात के साथ पूरा कर दो और अपना फिक्र व गुम इस धोखे के घर से हटा कर हमेशा रहने वाले घर की तरफ़ लगा दो। इन चीज़ों पर एहतिमाम करने से तुम दुनिया में इज्जत की ज़िन्दगी गुज़ारोगे, आख़िरत में बे फ़िक्र और एजाज़ व इकराम के साथ पहुँचोगे और जन्नत, जो नेमतों का घर है, उसमें अल्लाह जल्ल शानुहू रब्बुल इन्ज़त के पड़ोस में हमेशा हमेशा रहोगे।

 

आक़ा का सब’कुछ छोड़कर एक अल्लाह की तरह रुज़ुह –

उस बांदी के आका ने बांदी से खिताब करके पूछा कि तूने शैख की बातें सुन लीं। ये सच हैं या नहीं, बांदी ने कहा कि बिल्कुल सच हैं, शैख़् ने कहा कि अच्छा तो तू आज़ाद है। और इतना इतना सामान तेरी नज़र है और अपने सब गुलामों से कहा कि तुम भी सब आज़ाद हो और मेरे माल में से इतना इतना माल तुम्हारी नजर है। और मेरा यह घर और जो कुछ माल इसमें है, सब अल्लाह की राह में सदका है और घर के दरवाजे पर एक मोटे से कपड़े का पर्दा पड़ा हुआ था, उसको उतार कर अपने बदन पर लपेट लिया और अपना सारा लिबासे फ़ाखिरा उतार कर सदका कर दिया।

 

बांदी का भी सब कुछ छोड़ना –

उस बांदी ने कहा कि मेरे आका तुम्हारे बाद मेरे लिए भी यह ज़िन्दगी अब खुशगवार नहीं है, और उसने भी एक मोटा सा कपड़ा पहन कर अपना सारा करके जेब व जीनत का लिबास और अपना सारा माल व मता् सदका आका के साथ ही हो ली। और मालिक बिन दीनार रह उनको दुआयें देते हुए उनसे रूखसत हो गये और वे दोनों उस सारे ऐश व इशरत को तलाक देकर अल्लाह की इबादत में मश्गूल हो गये और इसी हालत में उनका इंतिकाल हो गया,

 ग-फ-रल्लाहु लना व लहुम।

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

पोस्ट को share करें

दुआ की गुज़ारिश

 

Comments