Maal(Daulat) se Muhabbat - माल व दौलत एक फितना है

 

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

माल की मुहब्बत –

अगर आदमी के लिए एक वादी माल की हो तो दूसरी को तलाश करता है, और दो हों तो तीसरी को तलाश करता है। आदमी का पेट मिट्टी के सिवा कोई चीज नहीं भरती।
आदमी के लिए एक जंगल खजूरों का हो तो दूसरे की तमन्ना करता है और दो हों तो तीसरे की और इसी तरह तमन्नाएं करता रहता है। उसका पेट मिट्टी के सिवा कोई चीज़ नहीं भरती।

 

इसके मुतल्लिक़ हदीसें –

हज़रत कअब रजि० फरमाते हैं कि मैं ने हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह इर्शाद फ़रमाते हुए सुना है कि हर उम्मत के लिए एक फ़ितना होता है (जिसमें मुब्तला होकर वह फ़ितने में पड़ जाती है) मेरी उम्मत का फ़ितना माल है।

बुख़ारी शरीफ़ की हदीस में है हुजूरे अवदस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है कि खुदा की कसम! मुझे तुम्हारे ऊपर फ़ख्र व फाका का ख़ौफ़ नहीं है, बल्कि इसका ख़ौफ़ है कि तुम पर दुनिया की वुस्अत हो जाए जैसा कि तुमसे पहली उम्मतों पर हो चुकी है, फिर तुम्हारा उसमें दिल लगने लगे जैसा कि उनका लगने लगा था, पस यह चीज़ तुम्हें भा हलाक न कर दे जैसा कि पहली उम्मतों को कर चुकी है।

माल का किस पर ख़र्च करना  सवाब है –

हज़रते अक्दस शाह अब्दुल अज़ीज़ साहब कुद्दस सिरहू फ़रमाते हैं कि ल का खर्च करना सात तरह से इबादत है-

1. जकात, जिसमें उशर भी दाखिल है।

2. सदका-ए-फ़ित्र,

3. नफ्ल खैरात जिस में मेहमानी भी दाख़िल है और कर्ज़़दारों की इआनत भी।

4. वक्फे मसाजिद, सराय, पुल वराह बनाना ।

5. हज, फ़र्ज़ हो या नफ़्ल या किसी दूसरे की हज में मदद हो, तोशा से या सवारी से

6. जिहाद में खर्च करना कि एक दिरम उसमें सात सौ दिरम के बराबर है |

7. जिनके इखराजात अपने ज़िम्मे हैं उनको अदा करना जैसा कि बीवी का और छोटी औलाद का खर्च है और अपनी वुस्अत के बाद मुहताज रिश्तेदारों का खर्च वगैरह।

 

माल की आफतें और नुक्सान –

अव्वल यह है कि ना जायज़ तरीके से कमाया जाता है। किसी अर्ज़ किया कि अगर जायज़ तरीके से हासिल हो तो, आपने फरमाया कि बे जगह खर्च होता है। किसी ने अर्ज़ किया कि अगर अपने महल ही पर खर्च किया जाए तो, आपने फरमाया कि उसकी इस्लाह का फिक्र अल्लाह जल्ल शानुहू से तो मश्गूल ही कर देगा और यह ला इलाज बीमारी है कि सारी इबादात का लुब्बे लुबाब और मग्न अल्लाह जल्ल शानुहू का ज़िक्र व फ़िक्र है और उसके लिए फारिग दिल की ज़रूरत है और साहिबे जायदाद शख़्स दिन भर, रात भर, काश्तकारों के झगड़ों की सोच में रहता है, उनसे वसूली के हिसाब किताब में रहता है।

इसी तरह ताजिर का हाल है कि अगर शिरकत में तिजारत हो तो शरीकों की हरकतें हर वक्त की एक मुस्तकिल मुसीबत और मुस्तकिल मश्गला है और जहा तिजारत हो तो नफे के बढ़ने का फ़िक्र हर वक्त, अपनी मेहनत में कोताही का ख्याल, तिजारत में नुक्सान का फ़िक्र ऐसे उमूर हैं जो हर वक़्त मुसल्लत रहते हैं। मशागिल के एतिबार से सब से कम वह खज़ाना है जो नकद की सूरत में अपने पास हो, लेकिन उसकी हिफ़ाज़त और इज़ाअत (ज़ाया होने) का अंदेशा, चोरों का फ़िक्र और उसके खर्च करने के मसारिफ का फिक्र और जिन लोगों की निगाहें उसकी तरफ़ लगी रहती हैं, उनका ख्याल, ऐसे तफक्कुरात हैं कि जिनकी कोई इंतिहा नहीं है और यही वे सब दुन्यवी मज़र्रात हैं जो माल के साथ लगी रहती हैं और जिसके पास बद्रे ज़रूरत हो वह इन सब फ़िकरों से फारिग है |

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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