Ayatul Kursi Benefits and Tafseer - आयतुल कुर्सी हिंदी में

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

 

आयतुल कुर्सी  – (क़ुरान हदीस की रौशनी में )

 

अयतुल कुर्सी क़ुरआन करीम  कि दूसरी सूरह बकरः की (255 ) आयात  है।
इस आयत की बहुत सी फजीलत अहादीस में बयान की गई हैं। ये क़ुरान करीम की अजीब तरीन आयत है

आयतुल कुर्सी के मुतल्लिक़ अहादीस

“ हज़रत अबू हुरैरा (र०) से रवायत है के रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद मनकुल है

कि सूरह बकरा में एक आयत है जोसय्यदतूल आयातुल क़ुरआन यानी क़ुरआन करीम की आयतो की

सरदार है और ये भी मजकुर है के जिस घर में वो पढ़ी जाए शैतान उससे निकल जाता है ”

 

“ हज़रत अबू उमामा (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :

जो शख़्स हर फ़र्ज़ नमाज़  के बाद अयतुल् कुर्सी पढ़  लिया करे,उसको जन्नत में जाने से सिर्फ उसकी मौत ही  रोके हुए हैं।एक रिवायत में अयतु्ल कुर्सी के साथ सूरह  कुल हू अल्लाहु अहद पढ़ने का ज़िक्र है ”(तबरानी)

 

हज़रत हसन बिन अली (रज़ि०) रिवायत करते हैं कि रसुलाल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :

जो शख़्स फ़र्ज़ नमाज़ के बाद अयतु्ल कुर्सी पढ़ लेता है,वह दूसरी नमाज़ तक अल्लाह तआला  की हिफाज़त में रहता है ”(तबरानी)

 

अयतुल कुर्सी  तर्जुमा और तफ़्सीर –

 

بِسمِ اللّٰہِ الرَّحمٰنِ رحیم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पे मेहरबान बहुत मेहरबान है

 

 

ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ 

अल्लाह वो  है जिस के सिवा कोई माबूद नहीं,जो सदा जिंदा है,वो पूरी कायनात संभाले हुए हैं

 

तफ़्सीर

अल्लाह वह है जिस के सिवा कोई माबूद नहीं, यह है तोहिद का वह कलीमा जो अकीदे तोहिद की बुनियाद है के अल्लाह ताला के सिवा कोई माबूद नहीं,कोई इबादत के लायक नहीं, पस कुछ सीफतें अल्लाह ताला ने ज़िक्र फरमाई है।

पहली  सीफत अल्लाह तआला ने ज़िक्र फरमाई अल-हई (ٱلْحَىُّ ) यानी वो ज़िंदा है,और मुराद ये के सदा ज़िंदा है, यानी और जितने लोगों को(इन्सानों को, जानवरों को,जिन्नात को, मलाएका को)जिस जिस को ये ज़िन्दगी हासिल है वो  ज़िन्दगी हमेशा के लिए नहीं है।एक ना एक वक़्त उनको मौत आनी है।और कोई ऐसी मखलूक नहीं जिसको किसी ना किसी वक़्त मौत ना आनी हो।लेकिन अल्लाह तआला की वो ज़ात है जो हमेशा से ज़िंदा है और हमेशा ज़िंदा रहेगा।

दूसरी सीफत है अल-कय्यूम(ٱلْقَيُّو)इसका ये तर्जुमा है के पूरे जहां को संभाले हुए है।असल में ये जो लफ्ज़ है ये निकला है

क्याम से,और कारिम कहते हैं खड़े होने वाले को,और कय्यूम और कय्याम उसके  मुबल्गे  का सेगा है,उसके माना है जो खुद भी कायम रहे और खुद भी कायम रहकर दूसरों  को भी कायम रखे।और दूसरों को संभाले रखे। ये अल्लाह तआला की

खास सिफत है जिसमें कोई मखलूक शरीक नहीं हो सकती।लिहाज़ा कोई दूसरी ज़ात  कय्यूम नहीं हो सकती।किसी इंसान को कय्यूम कहना जायज़ नहीं।हमारे यहां रिवाज़ चल पड़ा है के जिस का नाम अब्दुल कय्यूम है उनके नाम को बिगाड़ के

सिर्फ कय्यूम बोलते है।एसा  कहना गुनाह है।क्युकी सिर्फ क्वय्यूम अल्लाह का नाम है और किसी इंसान को इसका कहना शिर्क का अंदेशा है।अगर्चे ये बे खयाली में होता है इसलिए इसपर कुफ्र और शिरक का फतवा नहीं लगा सकते।

उसी तरह अब्दुल रहमान को सिर्फ रहमान कहना,अब्दुल सत्तार को सिर्फ सत्तार कहना वगैरह,इससे से परहेज़ करना चाहिए।

 

لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ 

उसको कभी ना ऊंघ लगती है ना नींद

 

तफ़्सीर

अल्लाह तआला को ना कभी ऊंघ लगती है और ना नींद,यानी ये के अल्लाह तआला नींद

से और ऊंघ से पाक है ना उसको कभी ऊंघ लगती है नहीं कभी नींद।

सेना(سِنَةٌ ) केहते हैं इब्तिदाई नींद यानी ऊंघ को,और नौम (نَوْمٌ ) बाकयदा पूरी नींद को कहते हैं।तो अल्लाह तआला को ना नींद लगता है ना ऊंघ।

 

لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ 

आसमानों में जो कुछ है वह भी और जमीन में जो कुछ है वह भी सब इसी का है 

 

तफ़्सीर – 

ज़मीनो आसमान के दरमियान जितनी भी चीज़े हैं  या ज़मीनो आसमान के अंदर जितनी चीज़े हैं।

वो सारी की सारी अल्लाह की मिलकियत  है।कोई और अल्लाह तआला  के मिलकियत

में शरीक नहीं।वो खुद मुख्तार है

 

مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ

कौन है जो इसके हुज़ूर,इसके इज़ाज़त के बगैर किसी की सिफारिश कर सकें?

तफ़्सीर

पहले के काफिरों का ये अकीदा  होता था के उनके जो बुत या उनके देवता थे उनकी हाजतों  का

अल्लाह से सिफारिश करेंगे,तो इस  आयत में उसकी तकदीद हो रही है के 

अल्लाह के तरफ से कोई सिफारिश नहीं कर सकता जब तक खुद अल्लाह की इजाज़त ना हो।अल्लाह के इजाज़त के बेगौर कोई सिफारिश नहीं कर सकता,हां जिसको अल्लाह खुद इजाज़त दे दे

जैसे के पैगम्बरों  को बाज मर्तबा इजाज़त दी है और जनाबे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को

कयामत के दिन सिफारिश का मर्तबा दिया जाएगा। ये अल्लाह का करम है।

 

يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ 

वह सारे बंदों के तमाम आगे पीछे के हालातों को  खूब जानता है

तफ़्सीर –

अल्लाह रब्बुल इज्ज़त इंसानों के  सारे आगे पीछे के हालातों को खूब जानता है,इसके  वास्ते

उसको किसी इंसान  की शिफारिश की जरूरत ही नहीं   

 

وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ 

और वह लोग इसके इल्म की कोई बात इसके इल्म के दायरे में नहीं ला सकते, सिवाऐ  उस बात के जिससे वह खुद चाहे

 

तफ़्सीर –

एक तो अल्लाह तआला इंसानों और जिन्नात के हर इल्म के बारे में जानता है लेकिन कोई भी इंसान

या जिन्न अल्लाह तआला के  इल्म से हरगिज़ वाकिफ नहीं है,अल्लाह तआला के इल्म का

कोई इहाता नहीं कर सकता,हां जितना इल्म अल्लाह तआला किसी  को देना चाहता हो,

वो उसे अता कर देता है।अल्लाह रब्बुल इज्ज़त फरमाते है के इल्म गैब किसी को नहीं हो सकता

अलबत्ता अल्लाह जिस को बताना चाहें।जैसे अंबियायों को  अल्लाह जितना चाहते हैं बता देते हैं  “वही”  के जरिए।

 

وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ 

इसके कुर्सी ने सारे आसमान और जमीन को घेरे हुए  है

तफ़्सीर – 

ये कुर्सी क्या चीज़ है ये तो अल्लाह तआला ही बेहतर जनता है,अलबत्ता अल्लाह तआला

  उठने बैठने की जो शिफ़ात होती है उससे बेनेयाज है,और ना किसी जगह के मुहताज हैं।
एक रिवायत से मालूम होता है के अर्श और कुर्सी दोनों बहुत अजीमो शान जिस्म हैं,

जो तमाम आसमान और ज़मीन से बे इंतेहा दर्ज़े  बड़े हैं।
जिस तरह अर्श एक जिस्म है उसी तरह कुर्सी एक जिस्म है बाकी अल्लाह बेहतर जानते हैं।

 

وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا 

और उन दोनों के निगेबानी से इसे  जरा भी बोझ नहीं होता

 

तफ़्सीर

आसमान और ज़मीन के निगरानी से अल्लाह तआला को कभी बोझल या कभी थकावट नहीं होता।

 

وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ 

और वह बड़ा आली मकाम, साहिबे अजमत है।

 

तफ़्सीर – 

और अल्लाह की जात बहुत आली मक़ाम है बड़ी अजमत वाली है|

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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दुआ की गुज़ारिश

 

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