Ek Sabak Amoz waqiya - माँ बाप की नाफ़रमानी

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

 माँ बाप के की नाफ़रमानी का वाकिया

 

एक साहब कहते हैं के उनके करीबी रिस्तेदार से  एक सच्चा वाक़िया सुना – 

कहते हैं के एक शख्स जो अपने बीवी और एक बेटे के साथ रहते थे,अपने बेटे को  उन्होंने पढ़ाया लिखाया जब वो बेटा जवान हुआ तो उसकी बड़े धूम धाम से शादी कराई,उस नौजवान को  अपनी बीवी से बहुत प्यार था। उसकी बीवी कामचोर थी और उसके मां-बाप की खिदमत को बोझ  समझती थी,उसको लगा कि उसका शौहर मुझसे बहुत प्यार करता है,तो  क्यों ना इसका फायदा उठाया जाये और वो अपने शोहर से नाराज रहने लगी।नौजवान ने अपनी बीवी से नाराजगी और अलग अलग रहने का वजह पूछी , वह बोली कि मैं ठीक तभी रहूंगी जब तुम अपने मां बाप से अलग कहीं और रहो । तभी मैं आपके साथ खुश  रहूंगी। और कहने लगी मैं आपके  बूढ़े मां बाप की खिदमत और नहीं कर सकती। उस नौजवान ने अपनी बीवी की  बात मान ली, और अपने बूढ़े मां बाप को छोड़कर आखिरकार दूसरे शहर में घर ले लिया। मां बाप ने बहुत समझाया कि बेटा तेरे सिवा मेरा कोई नहीं,तु ही मेरा एक सहारा है,बहुत समझाया और इसरार किया लेकिन बेटे ने अपनी बीवी के आगे एक ना सुनी और अपने बीवी के साथ दूसरे शहर में आराम से जिंदगी गुजारता रहा। 

फिर कुछ अरसे के बाद  उस नौजवान को सऊदी अरब में नौकरी मिल गई। वहां नौकरी करने के लिए चला गया। बाद में उसने अपनी बीवी को भी अपने पास बुला लिया। अब वो नौजवान और उसकी बीवी हंसी खुशी सऊदी में रहने लगे।कुछ दो-तीन साल तक उस नौजवान अपने मां बाप को कभी कभी पैसा भेजा करता था। लेकिन जब बीवी के ताने देने के की खर्चा बहुत है बच्चे भी बड़े हो गए हैं इसलिए उसने वह भी कुछ पैसे अपने मां-बाप को भेजना बंद कर दिया, उसकी बीवी हमेशा कहती  थी  कि अगर आप अपने मां-बाप से ताल्लुक रखोगे तो मुझे भूल जाना,वगैरह 

 हज का क़बूल न होना –

इसी कश्मकश में काफी अरसा गुजर गया  वो नौजवान अपने मां-बाप को बिल्कुल ही भूल गया।
सऊदी में रहते हुए  उस नौजवान ने काफी उम्रे और हज किये,जब भी वो हज या उमराह करता उसके दिल में एक अजीब सी  कैफियत होती और दिल में हमेश ख्याल आता की तेरा हज और उमराह मरदूद है और काबिले क़ुबूल नहीं ,उसका दिल हमेशा बेचैन रहता था

वो नौजवान परेशान होकर एक बुजुर्ग के पास आया जो वहां पास में खड़े थे, और अपना सारा हाल उस बुज़ुर्ग को  सुनाया और कहने लगा, मुझे  12 साल हो गए यहाँ हज करते हुए ,और जब भी मैं काबे का तवाफ़ करता हूं मेरा दिल बेचैन हो जाता है और दिल में यह ख्याल आता है कि तेरा  हज कुबूल नहीं है तेरा हज मर्दुद है। उन बुजुर्ग ने फरमाया क्या तुमने किसी का दिल दुखाया है,या किसी को नाराज़ किया है

 उस नौजवान को अचानक याद आया और  फिर सारा किस्सा सुनाया के,  मैंने अपने बीवी के कहने पर अपने माँ बाप को छोड़ दिया और कई अरसा  हो गया उनकी खबर भी न ली  उन बुजुर्ग ने कहा यहाँ हज करने से कोई फायदा नहीं जब तक तुम अपने अपने मां-बाप को राजी नहीं करोगे तब तक हज और उमराह  कबूल नहीं  होगी और कहा, जाओ जाकर पहले अपने मां-बाप की खिदमत करो और उनको राज़ी करो।

नौजवान का पछताना –

उस नौजवान को गैरत आई, बीवी से बोला तू रहे या ना रहे मुझे कोई परवाह नहीं मैं मां-बाप के पास जा रहा हूं।
अगले दिन ही उस नौजवान ने अपने घर की टिकट बनवाई और अपने मां-बाप से माफी मांगने की गरज से अपने मुल्क वापस आ गया,अपने गांव पहुंचा,12 साल गुजर गए थे  सारा नक्शा बदल गया था,घर की भी पहचान नहीं रही फिर उसने उसी गांव के ही आदमी से पूछा और अपने बाप का नाम बता कर हाल मालूम करना चाहा,उस आदमी ने इस नौजवान को नहीं पहचान पाया, और उस आदमी ने बताया हां यहां पास के घर में बूढ़े मियां बीवी रहते थे, बहुत बूढ़े  हो चुके थे

  और बहुत बीमार रहते थे जब से  उनका बेटा गया है, एकदम गम में कमजोर हो गए,कोई पूछने वाला नहीं, और इसी हाल में कुछ दिन पहले उस बूढ़े आदमी का इंतकाल हो गया और अब  उसकी बीवी बीमारी की हालत में घर में रहती है, और अल्लाह से सिर्फ एक ही दुआ करती रहती  है के मेरे बेटे को भेज दे।पड़ोस के लोग रहम करके कुछ रोटियां खाने को उसको दे देते हैं, अब तो कमजोरी की वजह से उसकी  आंखें भी चली गई और वह अब देख नहीं सकती।

नौजवान से माँ की मुलाक़ात –

उस गांव के शख्स ने उसके  घर का पता बताया ,ये नौजवान अपने घर गया , घर की हालत खस्ता थी, घर  के दरवाज़े को खोला, दरवाजा की आहट सुनकर  बूढ़ी मां ने पूछा कौन है, बेटे को ख्याल हुआ की  12 साल के बाद आया हूं,माँ धुत्कार कर भगा देगी और कहेगी  अब क्यों आया है और कोई खबर भी  नहीं ली,और सोचा  मां मेरी बहुत नाराज होगी, दबी आवाज़ में बोला, मै आपका बेटा हु ,बूढी माँ ने आवाज़ सुनी तो उसके आखों में आंसू आ गए, कहने लगी बेटा तू आ गया,बहुत देर कर दी

आज अल्लाह ने मेरी दुआ कबूल कर ली, मैं हमेशा दुआ में अल्लाह से यह कहा करती थी के मेरे बेटे को जल्दी से भेज दे , तेरे इंतज़ार में और  कमज़ोरी में मेरी आँखों की बिनाई भी जाती रही, फिर बोली बेटा तेरा चेहरा मेरे पास ले आ, मै देख तो नहीं सकती लेकिन तेरे चेहरे को छूना चाहती हूँ  और फिर कहा

बेटा  तेरे अब्बा  तेरा इंतज़ार करते करते इस दुनिया से चले गए,अब तू आया है तो मुझे छोड़ कर न जाना,
यह सुनकर वो नौजवान रोने लगा और अपनी माँ से लिपट गया,बोला माँ मुझे माफ़ कर दे मैंने बड़ी जुल्म किया अब मै तुझे छोड़ कर नहीं जाऊंगा, बूढी माँ बोली मैंने माफ़ किया,अल्लाह भी तुझे माफ़ करे ,तू हमेशा खुश रहे 

अल्लाह का करना एसा हुआ के कुछ ही दिन गुज़रे थे के उस बूढी माँ का भी इन्तेकाल हो गया,उस नौजवान ने कफ़न दफ़न किया और अपनी माँ  को सुपुर्दे ख़ाक किया, अगली बार जब हज का महीना आया तो उस ने फिर से हज की और कहते हैं के इस बार कोई ख्याल नहीं आया और दिल के इत्मीनान के साथ हज की

आखिर में –

तो पता ये चला के अगर माँ बाप राज़ी नहीं हैं तो कोई भी अमल क़ाबिले क़ुबूल नहीं चाहे कितने ही नेक क्यों न हो और  मस्जिदे हराम में नमाज़ क्यों न पढ़ते हों,  आज हम चंद दिनों के इश्क़ में  अपने माँ बाप की नाफरमानी करते हैं, जब एक सहाबिये रसूल को अपने माँ की नाराज़गी की वजह से मौत के वक़्त रूह निकलने में मुश्किल हो रही थी,तो गौर करें की हमारा क्या होगा

अल्लाह हमें माँ बाप  की क़द्र और फरमाबरदारी की तौफ़ीक़ आता फरमाए – अमीन 

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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दुआ की  गुज़ारिश 

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