Nabi S.A.W ke 4 khalifa - खुलफ़ा ए राशिदीन

 

खुलफ़ा ए रशिदीन –

ख़लीफा के माना  ” अल्लाह के नाएब “ है,यानी पूरी इस्लामी हुकूमत  को किसी एक मुक़र्रर शख्स के ज़ेरे साया देना|

जब तक नबी करीम (स०अ०) दुनिया में थे, तब तक आप (स०अ०) इस्लामी हुकूमत के निगेबान थे,लेकिन जब आप दुनिया से रुखसत फरमा गए तो किसी न किसी को इस्लाम की बागडोर संभालनी थी तो इसलिए आप (स०अ०) के बाद 4 मशहूर साहबा (रज़ी०) को मुन्तखब किया गया |

खुलफ़ा ए रशिदीन का मतलब नेक खलीफा यानी जिनके जैसा पुरे दुनिया में मिलना नामुमकिन है |

 

4 खुलफ़ा ए रशिदीन –  

(1) हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़ी०)

(2) हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ी०)

(3) हज़रत उस्माने गनी (रज़ी०)  

(4) हज़रत अली ए मुर्तज़ा (रज़ी०)

 

(1) हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़ी०) –

हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) का नाम अब्दुल्लाह इबने कहाफ़ा था|कुन्नियत उनकी अबू -बक्र और लक़ब -सिद्दीक था|रसूल अल्लाह (स०अ०) के वफात के बाद सहाबा (रज़ी०) ने उनसे बैत की और मुहाजिरीन और अंसार ने उन्हें ख़लीफा मुक़र्रर किया |नबी करीम (स०अ०) के नबूवत के एलान के बाद सबसे पहले शख्स हैं, जो इस्लाम में दाख़िल  हुए | 

हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) हमेशा लोगों से नरमी से पेश आते और कोई भी मामला हो,दीन या दुनिया,सहाबा से मशवरा करते थे ,कमजोरों और बुढो का आप खास ख्याल रखते |

 

इस्लाम के लिए सब कुछ कुर्बान करना – 

हज़रत अबू बक्र सद्दीक (रज़ी०) जब इस्लाम लाए तो उनके पास चालीस हज़ार दिरहम थे,जो उन्होंने सब अल्लाह के राह में खर्च कर दिया|

उस ज़माने में कितने ही मुसलमान जो काफिरों के यहाँ गुलाम थे , हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) ने अपने माल से खरीद कर आज़ाद करवाया उन्ही में से हज़रत बिलाल (रज़ी०) भी थे |

तबूक के लडाई के वक़्त जब नबी करीम (स०अ०) ने माल जमा करने का हुक्म दिया,हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) ने घर में  जो कुछ था सब आप (स०अ०) के हुजुर में पेश कर दिया,आप (स०अ०) ने फ़रमाया -अबू बक्र, पीछे  क्या छोड़ कर आए,जवाब दिया – मै तो  अल्लाह और उसके रसूल को छोड़ कर आया हु|

 

 वफात  का बयान –

हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़ी०) की वफात 63 साल उम्र में हुई,हिज़रत के तेरहवे साल,दूसरी या तीसरी जामद उल आखिर को जुमाह के दिन वफात पाई|

आप (रज़ी०) ने वफात से पहले खिलाफत की ज़िम्मेदारी हज़रत उमर (रज़ी०) को सौपी,हज़रत उमर (रज़ी०) ने आप का जनाज़ा पढाया और आप, नबी करीम (स०अ०) के पास का दफन हुए |

 

(2) हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ी०) –

हज़रत उमर (रज़ी०) एक जलिलो कद्र सहाबी और दुसरे ख़लीफा थे,आप अदल और इन्साफ पर कायम रहते और नबी करीम (स०अ०) की सुन्नत की पूरी पैरवी करते,काफिरों के मुकाबले में आप शख्त थे | रसूल अल्लाह (स०अ०) के साथ जंगे बदर,उहद,फ़तह मक्का.खैबर और तबूक की लडाईयों में शरीक़  थे|

हज़रत उमर (रज़ी०) की खिलाफत के ज़माने में तकरीबन  एक हज़ार से छत्तीस मुल्के फतह हुई,जिनमे दमिस्क,रोम,अर्कालान वगैरह सामिल हैं और  आप ने चार हज़ार मजिदें तामीर क़ी|

 

इस्लाम कुबूल करने का वाकिया –

मशहूर रिवायत है के हज़रत उमर (रज़ी०) एक दिन रसूल अल्लाह (स०अ०) के क़त्ल के इरादे से घर से निकले,लेकिन रास्ते में उन्हें अपनी बहन और बहनोई के ईमान लाने की खबर मिली तो  उनके घर गए और उन्हें मारा पीटा और फिर आखिर में क़ुरान सुना,जिससे उनका दिल पुरे तौर पर नर्म पड़ गया और वह जैद बिन अरक़म (रज़ी०) के मकान में पहुचे,जहाँ रसूल अल्लाह (स०अ०) छिप कर लोगों को दीन की तालीम दे रहे थे,वहां पहुँच कर आप ने दीन का कलमा पढ़ा | 

 

काफिरों पर रौब – 

जब हज़रत उमर (रज़ी०) इस्लाम में दाखिल हुए तो सारे मुसलमान बहुत ख़ुश हुए,जो छिप कर इबादत करते थे उनको एलानिया इबादत करने का मौका मिला,कबिले के काफिरों की हिम्मत ना थी के कोई उमर (रज़ी०) का मुकाबला कर सके |

हज़रत अली (रज़ी०) का बयान है की हज़रत उमर (रज़ी०) के अलावा किसी ने खुल कर हिजरत नही की | हज़रत उमर (रज़ी ०) ने जब इरादा किया तो हथियार बाधा,तीर कमान लिया और फिर मस्जिदे हराम में आए जहाँ क़ुरैश के लोग बैठे हुए थे,तवाफ़ किया ,नमाज़  पढी फिर लोगों से कहा – ” जो कोई अपने माँ – बाप को बेवल्द और अपने लड़कों को यतीम और अपनी बीवी को बेवा करना चाहे,इस वक़्त वह आकर मुझेसे मिले|किसी को हिम्मत न हुई के कुछ कहता |

 

 आप (रज़ी०) की शाहदत –

26 ज़िल हिज्जा (23 हिजरी ) चार शंबा  के नमाज़े फज्र में अबू लो लो फेरोज़ी मजूसी काफ़िर ने आप को शिकम में खंज़र मारा और आप ये ज़ख़्म खा कर तीसरे दिन शहीद हो गए |वफात के वक़्त आप की उमर 63 साल थी,हज़रत  शोहेब (रज़ी०) ने आप की नमाज़े ज़नाज़ा पढाई और हज़रत आयेशा (रज़ी०) की इज़ाज़त के बाद नबी करीम (स०अ०) और अबू बक्र (रज़ी०) के पास मद्फुन हुए | 

 

(3) हज़रत उस्मान बिन अफ्फान (रज़ी०)

हज़रत उस्मान (रज़ी०) उमैय्या  के खानदान से थे,आप के वालिद का नाम अफ्फान था वह, उमैय्या के पोते थे |आप हसीन व खुबसूरत थे,बचपन से ही पढना – लिखना सिखा था और अल्लाह ने  आप को बहुत माल व दौलत से नवाज़ा था,आप सदका और अल्लाह के रस्ते मे बहुत  खर्च किया करते थे |

 

इस्लाम में दाख़िल होने का किस्सा –

हज़रत उस्मान (रज़ी०) का हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) से बहुत अच्छा मेल -जोल था,दोनों अक्सर मिलते रहते थे,जब हज़रत उस्मान (रज़ी०) ने सुना के हज़रत अबू बक्र  (रज़ी०) ने इस्लाम क़बूल कर लिया है तो वह हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) के पास आते ही इस्लाम का ज़िक्र छेड़ दिया,लेकिन जब उन्होंने हज़रत अबू बक्र (रज़ी०) से इस्लाम की खूबियाँ सुनी तो दंग रह गएऔर उनके साथ रसूल अल्लाह (स०अ०) की खिदमत में हाजिर होने के लिए तैयार हो गए |अभी ये बातें हो हीं रही थी के रसूल अल्लाह (स०अ०) खुद ही तशरीफ़ ले आये,उन्होंने इस्लाम के बारे में एक दो बातें एसी कहीं की हज़रत उस्मान (रज़ी०) उन बातों से मुतास्सिर हुए और इस्लाम कबूल कर ली |

 

खिलाफत –

हज़रत उमर (रज़ी०) की शहादत के बाद दो दिन तक  जानशीनी के सवाल पर बहस चलती रही|लेकिन कोई फैसला न हो सका|आखिर में तै हुआ की तीन सहाबा,हज़रत अली (रज़ी०),हज़रत उस्मान (रज़ी०) और हज़रत अब्दुर -रहमान बिन औफ़ (रज़ी०) में से किसी एक को ख़लीफा बनाया जाये |

हज़रत अब्दुर -रहमान बिन औफ़ (रज़ी०) ने अपना नाम वापस ले लिया और उन्होंने हज़रत उस्मान (रज़ी०) के हक़ में अपनी राये दी और मुसलमानों ने हज़रत उस्मान (रज़ी०) के हाथ पर बैअत कर ली |जब आप खलीफा हुए तो आप की उमर 70 साल थी |

 

शहादत –

जब हज़रत उस्मान (रज़ी०) कुरान मजीद की तिलावत कर रहे थे तो कुछ बागियों ने आप के मकान की दीवार फांद कर घुस गए और  आप (रज़ी०) के दो ख़ादिमों को कतल किया फिर  आप को शहीद कर डाला |उस वक़्त आप की उमर 82 साल थी |जन्नतुल बकि में आप दफनाये गए |

 

(4) हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ी०) 

हज़रत अली (रज़ी०) अबुतालिब के छोटे बेटे और रसूल अल्लाह (स०अ०) के चचेरे भाई और दामाद  थे|हज़रत अली (रज़ी०) बचपन से ही रसूल अल्लाह (स०अ०) के साथ रहे और जब आप दस या ग्यारह साल के थे तो ने इस्लाम कबूल कर लिया,बचपन में सबसे पहले हज़रत अली (रज़ी०) ने ही इस्लाम कबूल किया था |

हज़रत अली (रज़ी०) बड़े दिलेर और ताक़तवर थे, इसी वजह से आप को ” शेरे खुदा ” कहा जाता था | हर लडाई में दुश्मनों का बड़ी दिलेरी से मुकाबला करते थे और अकेले ही सब काफिरों का सफाया करते |

 

खिलाफत –

हज़रत उस्मान (रज़ी०) के शहीद हो जाने के तीन दिन बाद 21 ज़िलहिज्जा को मस्जिदे नबवी में मुहाजिरीन और अंसार ने आपके हाथ पर बैअत की और आप खलीफा बने| खलीफा बनने के बाद उन्होंने सबसे पहले हज़रत उस्मान (रज़ी०) के कातिलों  को सज़ा दिलाने पर ध्यान दिया |

 

शहादत –

ख़ारिजा कौम, मुसलमानों के बड़े दुश्मन थे,उन्होंने तीन हजरात (हज़रत अली रज़ी०,हज़रत अमीर मुआविया रज़ी० और हज़रत अम्र बिन आस रज़ी०) को क़त्ल करने के लिए तीन आदमियों को मुनतखब किया, जिसमे इब्ने मुल्जिम ने हज़रत अली (रज़ी०) को क़त्ल करने की ज़िम्मेदारी ली थी |उस मलून ने एक हज़ार में तलवार खरीदी और उसे ज़हर में बुझा के रख ली|

हज़रत अली (रज़ी०) फज्र के लिए मस्जिद जा रहे थे के इब्ने मुल्जिम जो रात से घात लगाये बैठा था आप (रज़ी०) पर हमला कर दिया,तलवार का वार आप के सर पर पड़ा चूँकि तलवार में ज़हर लगा था तो उसका ज़हर पुरे बदन में फ़ैल गया |इब्ने मुल्जिम पकड़ा गया,आप (रज़ी०) ने अपने दोनों बेटों को बुलाया और नसीहत की के इबने मुल्जिम  को खाना खिलाओ,पानी पिलाओ और अच्छे से रखो |

दो दिन के बाद  इसी जख्म के साथ आप शहीद हो गए,बाज़ रिवायत के मुताबिक 17 रमजान को आप शहीद हुए|

 

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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दुआ की गुज़ारिश 

 

 

 

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