Huzur S.A.W ki Auladein – नबी (स०अ०) की औलादों का ज़िक्र

بِسمِ اللہِ الرَّحمٰنِ الرَّحِيم

शुरू अल्लाह के नाम से जो सब पर मेहरबान है बहुत मेहरबान है

 

 

नबी करीम (स०अ०) की औलादें –

आले रसूल (स०अ०) की मालूमात  हर मुस्लमान को हासिल करना ज़रूरी है | नबी करीम (स०अ०) की बीवियों (रज़ी०) का ज़िक्र पछले पोस्ट में बयान की गई थी और इस पोस्ट में इंशाल्लाह आप (स०अ०) की औलादे मोहतरम के बारे बयान की जाएगी |

मुवार्रिखीन और मुहद्दीसीन  का इस पर इत्तेफाक है कि नबी करीम (स०अ०) की कुल तीन लड़के और चार लडकियां हुईं | और बाज़ के नजदीक आप (स०अ०) के पांच बेटे हुए (अल्लाहु आलिम )

 

आप (स०अ०) के लड़के –
(1) हज़रत क़ासिम (रज़ी०) –

लड़कों में हज़रत क़ासिम (रज़ी०) सबसे पहले पैदा हुए, लेकिन इसमें इख्तलाफ है कि हज़रत ज़ैनब (रज़ी०) उनसे बड़ी हैं या छोटी | हज़रत क़ासिम (रज़ी०) का बचपन में ही बाज़ रिवायतों के मुताबिक दो साल की उम्र में इंतकाल हो गया था |

 

(2) हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ी०) –

दुसरे साहबजादे हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ी०) हैं जो नबूवत के बाद पैदा हुए | बाज़ रिवायत में उनका नाम तय्यब और ताहिर भी था | आप (रज़ी०) का भी इन्तिकाल बचपन में ही हुआ |

बाज़ ने लिखा है कि हज़रत क़ासिम (रज़ी०) के इन्तिकाल पर कुफ्फार बहुत ख़ुश हुए कि आप (स०अ०) की नस्ल मुंकतअ हो गई, जिस पर सुरह कौसर नाज़िल हुई और कुफ्फार के इस कहने  के, कि नस्ल ख़त्म हो गई तो कुछ दिनों में (नऔज्ज़ुबिल्लाह ) आप (स०अ०) का नामे मुबारक मिट जायेगा, आज 14 हज़ार साल के बाद भी हुजुर (स०अ०) नाम लेवा करोड़ो मौजूद हैं और क़यामत तक मौजूद रहेंगे |

 

(3) हज़रत इब्राहीम (रज़ी०) –

हज़रत इब्राहीम (रज़ी०) तीसरे साहबजादे थे, आप (रज़ी०) सन 8 हिजरी, ज़िल्हिज्जा के महीने में पैदा हुए | हुजुर (स०अ०) की आखिरी औलाद हैं | हज़रत इब्राहीम (रज़ी०) के पैदाइश  के सातवे दिन, हुजुर (स०अ०) ने उनका अकिका किया और दो मेढ़े जिबह किये | 10 रबीउल अव्वल सन 10 हिजरी में जब आप (रज़ी०) की उम्र सोलह साल (बाज़ में अठारह साल है) थी इन्तिकाल फ़रमाया |

 

हुजुर (स०अ०) की लडकियां –
(1) हज़रत ज़ैनब (रज़ी०) –

हज़रत ज़ैनब (रज़ी०) की पैदाइश, हुजुर (स०अ०) के निकाह से पांच साल के बाद हुई | उस वक़्त आप (स०अ०) की उम्र मुबारक तीस साल थी | हज़रत ज़ैनब (रज़ी०) का निकाह आप के खालाजाद भाई अबुल आस बिन रबीह से हुई | बदर की लड़ाई के बाद हिजरत की जिस में मुशरिकीन की नापाक हरकतों से आप ज़ख़्मी हुई | इसी बीमारी का सिलसिला आखिर तक चलता रहा और सन 7 हिजरी में आपका इन्तिकाल हुआ | आप (रज़ी०) की दो औलादें थीं |

 (2) हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) –

नबी करीम (स०अ०) की दूसरी साहबजादी हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) थी जो अपनी बहन हज़रत ज़ैनब (रज़ी०) से तीन साल बाद पैदा हुई | आप (रज़ी०) का निकाह अबू लहब ( आप (स०अ०) के चचा ) के बेटे उत्बा से हुआ था | बाद में उत्बा ने आप (रज़ी०) को तलाक दे दी थी | उसके बाद हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) का निकाह हज़रत उस्मान (रज़ी०) से हुई | दोनों  नबी करीम (स०अ०) के साथ  मदीना तय्यबा हिजरत फ़रमाया | बदर की लड़ाई के वक़त हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) बीमार हो गयीं इसी वजह से हुजुर (स०अ०) ने हज़रत उस्मान (रज़ी०) को जंग में शिरकत करने से मना फ़रमाया |

जब जंग ए बदर में मुसलमानों को फतह हुई, उस वक़्त हज़रत उस्मान (रज़ी०) अपनी बीवी हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) को दफना कर वापस आ रहे थे (यानी रुकैय्या (रज़ी०) का इन्तिकाल हो चूका था ) हज़रत उस्मान और हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) की एक औलाद हुई जिनका नाम अब्दुल्ल्लाह था |

 

 (3) हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ी०) –

आप (स०अ०) की तीसरी बेटी हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ी०) हैं | अव्वल आपका निकाह उत्बा बिन अबू लहब से हुए लेकिन रुखसती नहीं हुई, के उससे पहले ही आप (रज़ी०) का तलाक हो गया | हज़रत रुकैय्या (रज़ी०) के इन्तिकाल के बाद सन 3 हिजरी में हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ी०) का निकाह हज़रत उस्मान (रज़ी०)  से हुआ | हुजुर (स०अ०) का इरशाद है कि मैंने उम्मे कुलसुम (रज़ी०)  का निकाह आसमानी वहिह के हुक्म से उस्मान (रज़ी०) से किया |

सन  9 हिजरी में कुलसुम (रज़ी०) का इन्तिकाल हुआ | आप (रज़ी०) की कोई औलाद न थी |

 

(4) हज़रत सय्यदा फ़ातिमा (रज़ी०) –

हुजुर (स०अ०) की चौथी साहबजादी और जन्नती औरतों की सरदार हज़रत फातिमा (रज़ी०) हैं, नबूवत के एक साल बाद पैदा हुई | उनका नाम फातिमा वहिह से रखा गया था | जब आप (रज़ी०) की उम्र 15 साल थी तो आपका निकाह हज़रत अली (रज़ी०) से हुई |

तमाम साहब्जादियों में आप (स०अ०) को सबसे ज्यादा मुहब्बत हज़रत फातिमा (रज़ी०) से था | जब भी सफ़र से वापस आते तो सबसे पहले हज़रत फातिमा (रज़ी०) के यहाँ तशरीफ़ ले जाते थे |

हुजुर (स०अ०) के वफात के 6 महीने बाद हज़रत फातिमा रज़ी०) का भी इन्तिकाल हो गया | आपकी कुल 6 औलादें थीं |  हुजुर (स०अ०) की औलाद का सिलसिला इन्हीं से चला और इंशाअल्लाह क़यामत तक चलती रहेगी |

दीन की सही मालूमात  कुरआन और हदीस के पढने व सीखने से हासिल होगी |(इंशाअल्लाह)

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